बे-सबब/राजबीर देसवाल
छोड़ कर मुझको अकेला, बढ़ गया है कारवां,
कौन पीछे रह गया, मैं देखता ही रह गया.
तोड़ने को एक टुकड़ा, आसमान का, हाथ उठा तो,
लो मेरे ऊपर ही वो, सारा का सारा डह गया.
एक सहरा, प्यास का, सूखे का, बंजर का पला
पसरा-पसरा, ऊंघ कर, मुझको नकारा कह गया.
इक समंदर, ढीठ सा, ठहरा हुआ था आँख में,
आपको देखा तो फिर, वो बे-हिसाबा बह गया.
एक पत्थर कोह सा, दिल पे रहा, ता-ज़िन्दगी,
‘ए खुदा तू है ! ’ समझ कर, बोझ सारा सह गया.
क्यों किए हैं आप शिकवा, मेरे कहने पर जनाब,
जो कहा, जैसा कहा, बस बे-सबब ही कह गया.
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Sunday, November 22, 2009
Sunday, September 20, 2009
तू मेरा नाम भी ले जा

जब कतल किया मुझको तो इनाम भी ले जा
दीवान भी ले जा तू मेरा जाम भी ले जा
ले जा मेरे अशआर ये सब तेरे लिए हैं
और इनमे छुपा जज्बये नाकाम भी ले जा
सोचा था तू तड़पेगा कभी याद में मेरी
जो दिल में पले वो मेरे एह्वाम भी ले जा
अब मुझको नहीं रास आस रहा शोबए उल्फत
आगाज़ भी ले इसका तू अंजाम भी ले जा
तुने तो तिजारत से भी छीनी है सदाक़त
ले माल भी ले जा तू मेरा दाम भी ले जा
अब आने लगी रास मुझे शब् की स्याही
अब सुबह भी ले जा तू मेरी शाम भी ले जा
‘आमिल’ हूँ मेरे नाम से पहचान है तेरी
तू जा ही रहा है तो मेरा नाम भी ले जा
राजबीर देसवाल २००७
दीवान भी ले जा तू मेरा जाम भी ले जा
ले जा मेरे अशआर ये सब तेरे लिए हैं
और इनमे छुपा जज्बये नाकाम भी ले जा
सोचा था तू तड़पेगा कभी याद में मेरी
जो दिल में पले वो मेरे एह्वाम भी ले जा
अब मुझको नहीं रास आस रहा शोबए उल्फत
आगाज़ भी ले इसका तू अंजाम भी ले जा
तुने तो तिजारत से भी छीनी है सदाक़त
ले माल भी ले जा तू मेरा दाम भी ले जा
अब आने लगी रास मुझे शब् की स्याही
अब सुबह भी ले जा तू मेरी शाम भी ले जा
‘आमिल’ हूँ मेरे नाम से पहचान है तेरी
तू जा ही रहा है तो मेरा नाम भी ले जा
राजबीर देसवाल २००७
Sunday, September 13, 2009
आज गुस्ताख हुई जाती है क्यूं बादे नसीम
आज गुस्ताख हुई जाती है क्यूं बादे नसीम
क्या किसी शोख की ज़ुल्फों से लिपट आई है
वो हैं ज़ालिम कि मेहरबान मैं ये कैसे पूछूं
मेरी हिम्मत ने बिखरने की कसम खाई है
जिंदगी बे-हिसो नाकाम हुई जाती है
इसमे हंगामा ऐ जज़्बात तो तो पैदा कर दे
शहर खामोश हुस शहर ऐ खामोशा की तरह
इसमे जीने सी कोई बात तो पैदा कर दे
ए मेरी जान-ऐ-ग़ज़ल तेरी वफाओं की कसम
तू नहीं साथ तो जीने मैं कोई जोश नहीं
मैं हूँ मख़मूर मये इश्क के पैमानों से
सागर-ओ-मीना-ओ-साकी का मुझे होश नहीं
मेरी पेशानी पे उगती ये पसीने की कली
मुझ को दिन रात के सब राज़ बता देती है
वो जो असरार छुपे रहते हैं नज़रों से मेरी
गोशे एहसास को चुपके से सुना देती है
जिंदगी फत्ब-ऐ-नब्बाज़ की मोहताज नहीं
नब्ज़ चलती हुई मालूम है कब थम जाए
और नस नस मैं ये बहता हुआ सरगरम लहू
बर्फ बन जाए या सड़कों पे कहीं जम जाए
मेरे महबूब ग़नीमत हैं ये लम्हे जब हम
एक दूजे के लिए ख्वाब बुना करते हैं
और महसूस किया करते हैं साँसों कि तपिश
बस यही पल है की भरपूर जिया करते है
राजबीर देसवाल
क्या किसी शोख की ज़ुल्फों से लिपट आई है
वो हैं ज़ालिम कि मेहरबान मैं ये कैसे पूछूं
मेरी हिम्मत ने बिखरने की कसम खाई है
जिंदगी बे-हिसो नाकाम हुई जाती है
इसमे हंगामा ऐ जज़्बात तो तो पैदा कर दे
शहर खामोश हुस शहर ऐ खामोशा की तरह
इसमे जीने सी कोई बात तो पैदा कर दे
ए मेरी जान-ऐ-ग़ज़ल तेरी वफाओं की कसम
तू नहीं साथ तो जीने मैं कोई जोश नहीं
मैं हूँ मख़मूर मये इश्क के पैमानों से
सागर-ओ-मीना-ओ-साकी का मुझे होश नहीं
मेरी पेशानी पे उगती ये पसीने की कली
मुझ को दिन रात के सब राज़ बता देती है
वो जो असरार छुपे रहते हैं नज़रों से मेरी
गोशे एहसास को चुपके से सुना देती है
जिंदगी फत्ब-ऐ-नब्बाज़ की मोहताज नहीं
नब्ज़ चलती हुई मालूम है कब थम जाए
और नस नस मैं ये बहता हुआ सरगरम लहू
बर्फ बन जाए या सड़कों पे कहीं जम जाए
मेरे महबूब ग़नीमत हैं ये लम्हे जब हम
एक दूजे के लिए ख्वाब बुना करते हैं
और महसूस किया करते हैं साँसों कि तपिश
बस यही पल है की भरपूर जिया करते है
राजबीर देसवाल
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